मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....
जब अपनी ही पहचान अपने ;
आँखो मे खो जाती है.....
क्षण-क्षण बढ़ती दुनिया मे जब ;
कदम पिछड़ते जाते है...
क्षण-क्षण रिश्तो के बंधन से ;
व्यक्ति छूटते जाते है...
भावनाओ को हर पल सूली पर चढ़वया जाता है ;
दुनिया चलती लाशो का बाज़ार भर रह जाती है.....
तब.......
मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....!!
अपने घर की नीव के पत्थर ;
जब पकड़ छोड़ने लगते है....
तब झुंझला कर युवा दीवारे ;
नीव नयी रख लेती है.....
उमर के सांझ की धूप तब बड़ी कठिन हो जाती है ;
फिर खुद को समझकर बूढ़ी नीव अंतर मान ढहा जाती है...
तब........
मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....
-----***प्रारब्ध***-----
Bahut hi badhiya Pratik bhai....
जवाब देंहटाएंaapne suggestion manga tha...
ye Prarabdh padh ke bas ek hi suggestion jehan me aa raha hai.....ki bas likhte rahiye.
rukiye mat...waiting for a lot from ur keys...