गुरुवार, 26 अगस्त 2010

ramcharit....

इक बार एक कंप्यूटर लाया गया...
मंत्री जी की टेबल पर रखवाया गया...
मंत्री ने उद्घाटन की काटी फिती...
और चेलो ने तालियो की बाजी जिती...

मात्र जी ने बटन दबाया...
और गर्व से पूछा...
"बता श्री राम कौन थे...?"
.
कप्यूटर कहने लगा...
"राम...! राम लूच्चा था लफंगा था...
लोगो की बीवियो को उठाया करता था,,,पापी था दुरात्मा था.."

मंत्री जी ने सुनते ही..ज़ोर से दहाड़ लगाई...बोले..
"अरे मूर्ख ये क्या कह रहा है...राम की इस पावन भूमी पर ही राम का नाम बदनाम कर रहा है...???
मैने राम चरित पूछा और तू चरित्र रावण का बता रहा है???"

कमपूटर भी दहाड़ कर बोला...
"अरे बेवकूफ़ इंसान..खादी मे छुपे भ्रष्टाचारी शैतान...
आकल ना होश...कन पकड़े खरगोश..
ये क्या फ़िज़ूल के इल्ज़ाम लगता है...
ग़लती तू करता है और इल्ज़ाम अपक्ष पर लागत है...
मैं नही राम का नाम तो तू खुद ही बदनाम करता है...
बटन रावण का दबाता है...और चरित्र प्रभु श्री राम का पूछता है....???"
-------------स्व. पं. गोवर्धनलालजी अवस्थी(साहीत्यरत्न,औरंगाबाद(महा.)-----

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

-----मौन रहकर क्षितिजो को ताकना-----

मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....
जब अपनी ही पहचान अपने ;
आँखो मे खो जाती है.....

क्षण-क्षण बढ़ती दुनिया मे जब ;
कदम पिछड़ते जाते है...
क्षण-क्षण रिश्तो के बंधन से ;
व्यक्ति छूटते जाते है...
भावनाओ को हर पल सूली पर चढ़वया जाता है ;
दुनिया चलती लाशो का बाज़ार भर रह जाती है.....

तब.......
मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....!!

अपने घर की नीव के पत्थर ;
जब पकड़ छोड़ने लगते है....
तब झुंझला कर युवा दीवारे ;
नीव नयी रख लेती है.....
उमर के सांझ की धूप तब बड़ी कठिन हो जाती है ;
फिर खुद को समझकर बूढ़ी नीव अंतर मान ढहा जाती है...

तब........
मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....
           
            -----***प्रारब्ध***-----