मंगलवार, 24 अगस्त 2010

-----मौन रहकर क्षितिजो को ताकना-----

मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....
जब अपनी ही पहचान अपने ;
आँखो मे खो जाती है.....

क्षण-क्षण बढ़ती दुनिया मे जब ;
कदम पिछड़ते जाते है...
क्षण-क्षण रिश्तो के बंधन से ;
व्यक्ति छूटते जाते है...
भावनाओ को हर पल सूली पर चढ़वया जाता है ;
दुनिया चलती लाशो का बाज़ार भर रह जाती है.....

तब.......
मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....!!

अपने घर की नीव के पत्थर ;
जब पकड़ छोड़ने लगते है....
तब झुंझला कर युवा दीवारे ;
नीव नयी रख लेती है.....
उमर के सांझ की धूप तब बड़ी कठिन हो जाती है ;
फिर खुद को समझकर बूढ़ी नीव अंतर मान ढहा जाती है...

तब........
मौन रहकर क्षितिजो को ताकना ;
आदत सी हो जाती है.....
           
            -----***प्रारब्ध***-----

1 टिप्पणी:

  1. Bahut hi badhiya Pratik bhai....

    aapne suggestion manga tha...

    ye Prarabdh padh ke bas ek hi suggestion jehan me aa raha hai.....ki bas likhte rahiye.

    rukiye mat...waiting for a lot from ur keys...

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