क्या तुम भी सोचते हो के मैं अत्याचारी था, दुराचारी था ..?
मैं तो बस पत्थर भर था... प्रभु के धर्म सेतु का ...
मैं तो बस निमित्त मात्र था... अधर्म के निखंदन का ...
...
मैंने न सोचा, कौन क्या कहेगा ...
कौन मुझे नराधम कहेगा...राक्षस या...व्यभिचारी कहेगा...
मैंने न सोचा , कभी दशहरे पर मेरा भरे चौक दहन भी होगा ...
मैं तो बस अपना करम किये जा रहा था...
अपने प्रभु प्रीत खातिर खुदका बलिदान किये जा रहा था....
मैंने सीता हरण किया ये आप का दृष्टिकोण हैं..
मैंने कभी कोई हरण किया ही नहीं....
मैं तो बस अपनी बेटी को मायके लेकर आया था...
बेटी को मायके लाना कोए हरण नहीं...
मुझको जो दशानन कहते हैं आज के युग के ये वासी....
अज का युग तो मेरे युग से भी ज्यादा अन्धकार में डूबा हैं...
लाखो रावन है पनपे यहाँ...अब तो मुझको भी डर सा लगता हैं...
मैं खुद आज प्रभु से एक और गुहार लगता हु...
आप के आने की खातिर फिर एक बार जन्म लेना चाहता हु...
मंजूर हैं मुझको मेरा दहन दोबारा...लेकिन धरती पर फिर से सतयुग आये...
मुझे मिटने की मंशा से आप को फिर धरती पर बुलाता हु...
मैं रावन..क्या सच में मैं बुरा था...??
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